Think And Grow In Life

-: सोच ऐसी जो आपमें बदलाव लाए :-

Search The Content

Sunday, February 5, 2017

श्रीमद्भागवत गीता के अनमोल विचार


         नमश्कार दोस्तों मैं हु Shubham आप सभी का स्वागत करता हु इस Blog पे।

1. मन अशांत है और उसे नियंत्रित करना कठिन है, लेकिन अभ्यास से इसे वश में किया जा सकता है।

2. लोग आपके अपमान के बारे में हमेशा बात करेंगे। सन्मानित व्यक्ति के लिए, अपमान मृत्यु से भी बदतर है।

3. प्रभुद्ध व्यक्ति के लिए, गंदगी का ढेर, पत्थर, और सोना सभी सामान।

4. निर्माण केवल पहले से मौजूद चीजो का प्रक्षेपण है।

5. व्यक्ति जो चाहे बन सकता है। यदी वह विश्वास के साथ इच्छीत वस्तु पर लगातार चिंतन करे।

6. उससे मत डरो जो वास्तविक नहीं है। ना कभी था ना कभी होगा। जो वातविक है, वो हमेशा था और उसे कभी नष्ट नहीं किया जा सकता।

7. ज्ञानी व्यक्ति को कर्म के प्रतिफल की अपेक्षा कर रहे अज्ञानी व्यक्ति के दिमाग को अस्थिर नहीं करना चाहिए।

8. हर व्यक्ति का विश्वास उसकी प्रकृति के अनुसार होता है।

9. जन्म लेने वाले के लिए मृत्यु उतनी ही निश्चित है। जितना की मृत्यु होने वाले के लिए जन्म लेना। इसलिए जो अपरिहार्य है उस पर शौक़ मत करो।

10. अप्राकृतिक कर्म बहुत तनाव पैसा करता है।

11. सभी अच्छे काम छोड़ कर बस भगवान में पूर्ण रूप से समर्पित हो जाओ। मैं तुम्हे सभी पापो से मुक्त कर दूंगा शौक मत करो।

12. किसी और काम पूर्णतः से करने से अच्छा है कि अपना काम करे, भले ही उसे अपूर्णतः से करना पड़े।

13. मैं उन्हें ज्ञान देता हु जो सदा मुझसे जुड़े रहते है और जो मुझसे प्रेम करते है।

14. मैं सभी प्राणियो को सामान रूप से देखता हु, ना कोई मुझे कम प्रिय है ना अधिक। लेकिन जो मेरी प्रेमपूर्वक आराधना करते है वो मेरे भीतर रहते है और मैं उनके जीवन में आता हूँ।

15. प्रबुद्ध व्यक्ति सिवाय ईश्वर के किसी और पर निर्भर नहीं करता।

16. मेरी कृपा से कोई सभी कर्तव्यों का निर्वाह करते हुए भी बस मेरी शरण में आकर अनंत अविनाशी निवास को प्राप्त करता है।

17. भगवान प्रत्येक वस्तु में है और सबको ऊपर भी।

18. बुद्धिमान व्यक्ति कामुक सुख में आनंद नहीं लेता।

19. आपके सार्वलौकिक रूप का न प्रारम्भ न मध्य न अंत दिखाई दे रहा है।

20. जो कार्य में निष्क्रियता और निष्क्रियता में कार्य देखता है। वह एक बुद्धिमान व्यक्ति है।

21. मैं धरती की मधुर सुगंध हूँ। मैं अग्नि की ऊष्मा हूँ, सभी जीवित प्राणियो का जीवन और सन्यासियो का आत्मसंयम हूँ।

22. तुम उसके लिए शोक करते हो जो शोक करने के योग्य नहीं है,
और फिर भी ज्ञान की बाते करते हो। बुद्धिमान व्यक्ति ना जीवित और ना हो मृत व्यक्ति के लिए शोक करते है।

23. कभी ऐसा समय नहीं था जब मैं, तुम, या ये राजा-महाराजा अस्तित्व में नहीं थे, ना ही भविष्य में कभी ऐसा होगा की हमारा अस्तित्व समाप्त हो जाये।

24. कर्म मुझे बांधता नहीं। क्योकि मुझे कर्म के प्रतिफल की कोई इच्छा नहीं है।

25. वह व्यक्ति वास्तविकता में मेरे उत्कृष्ट जन्म और गतिविधियों को समझता है, वह शरीर त्यागने के बाद पुनः जन्म नहीं लेता और मेरे धाम को प्राप्त होता है।

26. अपने परम भक्तो, जो हमेशा मेरा स्मरण या एक-चित्त मन से मेरा पूजन करते है, मैं व्यक्तिगत रूप से उनके कल्याण का उत्तरदायित्व लेता हूँ।

27. कर्म योग वास्तव में एक रहस्य है।

28. कर्म उसे नहीं बांधता जिसने काम का त्याग कर दिया है।

29. बुद्धिमान व्यक्ति को समाज कल्याण के लिए बिना आसक्ति के काम करना चाहिए।

30. जो व्यक्ति आध्यत्मिक जागरूकता के शिखर पर पहुँच चुके है, उनका मार्ग है निःस्वार्थ कर्म।
जो भगवान् के साथ संयोजित हो चुके है उनका मार्ग है स्थिरता और शांति।

31. यद्द्यापि मैं इस तंत्र का रचयिता हूँ, लेकिन सभी को यह ज्ञात होना चाहिए की मैं कुछ नहीं करता और मैं अनंत हु।

32. जब वे अपने कार्य में आनंद में आनंद खोज लेते है तब वे पुर्णतः प्राप्त करते।

33. वह जो सभी इच्छाएं त्याग देता है और "मैं" और "मेरा" की लालसा और भावना से मुक्त हो जाता है। उसे शांती प्राप्त होती है।

34. मेरे लिए ना कोई घृणित है ना प्रिय। किन्तु जो व्यक्ति भक्ति के साथ मेरी पूजा करते है, वो मेरे साथ है और मैं भी उनके साथ हूँ।

35. जो इस लोक में अपने काम की सफलता की कामना रखते है वे देवताओ का पूजन करे।

36. मैं ऊष्मा देता हु, मैं वर्षा करता हूँ और रोकता भी हूँ, मैं अमरत्व भी हूँ और मृत्यु भी।

37. बुरे कर्म करने वाले, सबसे नीच व्यक्ति जो राक्षसी प्रविक्तियो से जुड़े हुए है, और जिनकी बुद्धि माया ने हर ली है वो मेरी पूजा या मुझे पाने का प्रयास नहीं करते।

38. जो कोई भी जिस किसी भी देवता की पूजा विश्वास के साथ करने की इच्छा रखता है, मैं उसका विश्वास उसी देवता में दृढ़ कर देता हु।

39. खाली हाथ आये और खाली हाथ वापस चले। जो आज तुम्हारा है, कल और किसी का था, परसो किसी और का होगा। तुम इसे अपना समझकर कर मग्न हो रहे हो। बस यही प्रसन्नता तुम्हारे दुःखो का कारण है।

40. केवल कर्म करना ही मनुष्य के वश में है, कर्मफल नहीं। इसलिए तुम कर्मफल की आशक्ति में ना फंसो तथा अपने कर्म का त्याग भी ना करो।

41. दुःख से जिसका मन परेशान नहीं होता, सुख की जिनको आकांशा नहीं होती तथा जिसके मन में राग, भय और क्रोध नष्ट हो गए है, ऐसा मुनि आत्मज्ञानी कहलाता है।

42. हे कुंती नंदन! संयम का प्रयत्न करते हुए ज्ञानी मनुष्य के मन को भी चंचल इन्द्रियाँ बलपूर्व हर लेती है। जिसकी इन्द्रियाँ वश में होती है। उसकी बुद्धि स्थिर होती है।

43. क्रोध से सम्मोहम और अविवेक उत्पन्न होता है, सम्मोहन से मन भृष्ट हो जाता है। मन नष्ट होने पर बुद्धि का नाश होता है और बुद्धि का नाश होने से मनुष्य का पतन होता है।

और आखिर मे Do Subscribe And Share धन्यवाद।

No comments:

Post a Comment

Trending